मुंबई | 3 जून 2026
मुंबई में ‘चेंबर फॉर एडवांसमेंट ऑफ स्मॉल एंड मीडियम बिजनेसेज’ (CASMB) द्वारा आयोजित एक महत्वपूर्ण मंथन सत्र में, पूर्व आईएएस अधिकारी नानासाहेब पाटिल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर एक गंभीर और डेटा-आधारित चेतावनी जारी की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की आर्थिक राह अब ऐसी संरचनात्मक चुनौतियों के घेरे में है, जिन्हें केवल रुपये के स्थिरीकरण या हॉर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति सुधरने जैसे अस्थायी उपायों से ठीक नहीं किया जा सकता।

भारत के समक्ष ‘पॉलिक्रायसिस’ (बहुआयामी संकट)
CASMB के इस सत्र में प्रस्तुत आंकड़े चिंताजनक हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत पिछले एक साल में तीसरे स्थान से फिसलकर छठे स्थान पर आ गया है। रुपये ने ऐतिहासिक निचला स्तर छू लिया है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने अकेले मई 2026 में 32,000 करोड़ रुपये से अधिक की निकासी की है। कभी 56 अरब डॉलर सालाना रहने वाला शुद्ध एफडीआई (FDI) प्रवाह लगभग शून्य हो गया है। भू-राजनीतिक संघर्ष, जलवायु जोखिम, एआई क्रांति और चीन का निरंतर विनिर्माण वर्चस्व—ये सभी मिलकर वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि भारत का नीतिगत ढांचा उनसे तालमेल नहीं बिठा पा रहा है।

महाराष्ट्र सरकार के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव और नीति विश्लेषक नानासाहेब पाटिल ने कहा, “ये कोई दूर की भू-राजनीतिक घटनाएं नहीं हैं। ये सीधे भारत के आयात बिल, उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला, इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण इनपुट और ऊर्जा लागत को प्रभावित करती हैं। इन बाधाओं पर आने वाला हर अतिरिक्त रुपया भारत की विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता पर एक कर (टैक्स) के समान है।”
’चीन का दूसरा झटका’ और भारत की पिछड़ी स्थिति
मॅककिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट और हार्वर्ड ग्रोथ लैब के शोध का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने एक ऐसी सच्चाई सामने रखी, जो असहज करने वाली है: चीन न केवल भारत के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है, बल्कि वैश्विक विनिर्माण व्यवस्था को इस तरह से फिर से कॉन्फ़िगर कर रहा है कि भारत केवल एक दर्शक बनकर रह गया है।
चीन का वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में 27-29% हिस्सा है। 2025 में, औद्योगिक इनपुट—चिप्स, स्मार्टफोन घटक और मध्यवर्ती वस्तुओं—की आपूर्ति में चीन की भागीदारी 175 अरब डॉलर से अधिक बढ़ गई। चीन ‘कारखानों का कारखाना’ बना हुआ है, जो अन्य देशों के विनिर्माण को शक्ति प्रदान करता है।

वरिष्ठ पत्रकार और नीति विश्लेषक विजय गायकवाड ने कहा, “अनुसंधान और विकास (R&D) पर भारत का खर्च चीन की तुलना में जीडीपी के अनुपात में एक-चौथाई है। पूर्ण रूप से देखा जाए तो भारत चीन की तुलना में आरएंडडी पर 16 गुना कम खर्च करता है। यह विनिर्माण अंतराल का संरचनात्मक कारण है—और यह भाग्य नहीं, बल्कि एक नीतिगत विकल्प है।”
भारत के आईटी इंजन के लिए एआई का खतरा
दशकों से, भारत का आईटी सेवा क्षेत्र—जो 254 अरब डॉलर से अधिक का वार्षिक निर्यात करता है और 5.4 मिलियन पेशेवरों को रोजगार देता है—देश का मुख्य विदेशी मुद्रा अर्जक रहा है। सत्र का विश्लेषण एक गंभीर तस्वीर पेश करता है।
एंथ्रोपिक, ओपनएआई, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट द्वारा तैनात ‘एजेंटिक एआई’ सिस्टम अब स्वायत्त रूप से कोड लिखने, वर्कफ़्लो प्रबंधित करने और व्यावसायिक प्रक्रियाओं को चलाने में सक्षम हैं—जो कि भारत के आईटी निर्यात का मुख्य हिस्सा है। नीति आयोग का अपना अनुमान है कि तकनीकी क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या 2031 तक 7.5 मिलियन से घटकर 6 मिलियन रह सकती है।

विनिर्माण के लिए पांच रणनीतिक प्राथमिकताएं
सत्र में विनिर्माण को गति देने के लिए पांच सूत्रीय रणनीतिक एजेंडा प्रस्तुत किया गया:
ग्लोबल वैल्यू चेन टास्कफोर्स: इलेक्ट्रॉनिक्स, ईवी, सेमीकंडक्टर, रक्षा और चिकित्सा उपकरणों जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में शीर्ष 20 वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने के लिए विशेष प्रोत्साहन और 90-दिवसीय निर्णय चक्र।
आयात बाधाएं कम करना: बेस मेटल्स और विशेष रसायनों पर उच्च टैरिफ में कटौती।
’गिफ्ट सिटी’ मॉडल का विस्तार: विनिर्माण के लिए पूर्व-अधिग्रहीत भूमि और सिंगल-विंडो क्लीयरेंस वाली व्यवस्था का निर्माण।
PLI 2.0: अधिक महत्वाकांक्षी, सरल और जवाबदेही के साथ कम क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना।
बिजली दरें: भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धी दरों पर विश्वसनीय बिजली सुनिश्चित करना।

शहरीकरण का आयाम
2036 तक भारत की शहरी आबादी 60 करोड़ के पार हो जाएगी। नानासाहेब पाटिल ने जोर देकर कहा, “आर्थिक केंद्रीकरण और शहरीकरण कोई समस्या नहीं है, जिसे प्रबंधित किया जाए। ये वे तंत्र हैं जिनसे राष्ट्र धनी बनते हैं। प्रश्न यह है कि क्या भारत ऐसी शहरी प्रणाली तैयार कर सकता है जो घनत्व की लागत के बजाय एकत्रीकरण (agglomeration) के लाभों को हासिल कर सके।”
अंत में पाटिल ने कहा, “2047 का भारत दुनिया के सबसे शक्तिशाली आर्थिक मंचों में से एक बन सकता है। लेकिन इसके लिए बौद्धिक ढांचे, नीतिगत निर्णयों और पीढ़ीगत निवेश की आवश्यकता है। हमारे देश में ‘विचारों की कमी’ (Idea Deficit) उतनी ही खतरनाक है जितनी कि ‘पूंजी की कमी’।”
(नोट: यह रिपोर्ट CASMB – चेंबर फॉर एडवांसमेंट ऑफ स्मॉल एंड मीडियम बिजनेसेज द्वारा आयोजित मंथन सत्र पर आधारित है।)

